Monday, February 2, 2009

बोहुत बोलते हो तुम.............

भीड़ मैं एक आवाज आख़िर सुन ही ली मैंने
न जाने कौन था पर कह रहा था
बहुत बोलते हो तुम ........
अचानक विश्वविद्यालय के छात्र राजनीती के दिन याद आए
जब विरोध के स्वर सुन कर मंच से कूद पड़ना, लड़ना, झगड़ना
सब चलता था
पर आज अगर विरोध न हो तो ख़ुद को नेता होने की अनुभूति भी झटका दे दे जोर का
अपने शहर के एक युवक ने नाच बलिये में शायद शहर का नाम रोशन कर दिया
अब ये शायद क्यों आया ये बस भीड़ से उठी वो आवाज है
में कह रहा था की बड़े गौरव की बात है वगैरह वगैरह
और कोई भीड़ में से बोल ही पड़ा
के "बहुत बोलते हो लेकिन बस तुम ही क्यों बोल रहे हो वो अपने शहर का है उसे बोलने में शर्म आती है क्या?
और में खामोश हो गया................